Apurva Tidke
कुछ भीगी-सी थी मैं भीतर,सहमा हुआ सा मन-जीवन,
कुछ कर्ज़ है मेरे जीवन पर,सूर्य की लौ से मांगा है नवजीवन ।
लो आज बादल भी छा गए ,युँ फैला सन्नाटा है ,
जैसे इसी वक्त विलाप कोई किसी कंठ से फूटने वाला है।
दस्तक देती हर गरज,जैसे अनहोनी कोई होनी है ,
मानो बिगुल की देर है बस,और नदियाँ रक्त की बहनी हैं ।
बरस रहा है सावन, बेख़ौफ़ और बेबाक़ सा,
शमशानों से बहा चला है नदियों में धुँआ राख सा।
जब पाप धोती है गंगा निरंतर अजरा-अमर ,
तो दाग भी लगते तो है उसके पवित्र सम्मान पर ।
याद आती है रुदाली मोल जिसका आंसू से है,
थी पाक जो कोख वो आज चौराहे पर बिकती है ।
याद आती है शहादत, मिट्टी से मिली जो अब,
सड गया है ज़माना, यहाँ इज़्ज़त और बिकता है सब।
हर बूँद की टिप-टिप में, चीख़ है मासूम की,
चाहे गंगाजल ही बरसे होगा वो नाकाफ़ी ही।
भीग गयी मैं इस जग से,आबरु नहीं आँसू भी नहीं,
मलिन हो चुकी हूँ मैं, बरसात मुझे पसंद नहीं।

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